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बिहार में निलंबित CO की दोबारा पोस्टिंग पर सवाल, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में

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पटना के फुलवारीशरीफ के पूर्व अंचल अधिकारी पर गंभीर आरोप साबित होने और निलंबन के बावजूद दोबारा पोस्टिंग दिए जाने से राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

पटना/आलम की खबर: बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है, जहां प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर उठते संदेह अब ठोस उदाहरणों के साथ सामने आने लगे हैं। मामला पटना के फुलवारीशरीफ अंचल से जुड़ा है, जहां तत्कालीन अंचल अधिकारी चंदन कुमार पर कई गंभीर आरोप लगे, जांच में वे आरोप सही भी पाए गए, उन्हें निलंबित भी किया गया, लेकिन इसके बावजूद कुछ समय बाद न सिर्फ उन्हें बहाल कर दिया गया बल्कि राजधानी के ही दूसरे महत्वपूर्ण अंचल में दोबारा पदस्थापित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विभागीय कार्रवाई का उद्देश्य क्या रह जाता है, यदि दोष सिद्ध होने के बाद भी अधिकारी को उसी प्रणाली में वापस जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।

पूरा मामला तब चर्चा में आया जब यह जानकारी सामने आई कि एक न्यायिक मामले में लापरवाही के कारण जिला प्रशासन को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। संबंधित केस में अंचल स्तर पर हुई गड़बड़ियों के चलते मामला इतना गंभीर हो गया कि जिला अधिकारी को स्वयं अदालत में उपस्थित होना पड़ा। यह स्थिति किसी भी प्रशासनिक तंत्र के लिए बेहद असहज मानी जाती है और इससे साफ संकेत मिलता है कि निचले स्तर पर कार्यप्रणाली में गंभीर खामियां मौजूद थीं। इसी संदर्भ में जब जांच कराई गई तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं, जिनमें न केवल प्रक्रियात्मक त्रुटियां थीं बल्कि रिकॉर्ड संधारण और आदेशों के अनुपालन में भी भारी लापरवाही पाई गई।

जांच के दौरान यह सामने आया कि अतिक्रमण से जुड़े मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। नोटिस जारी करने में तय प्रारूप का उपयोग नहीं हुआ, कई मामलों में अभिलेखों का रख-रखाव ठीक से नहीं किया गया और आदेश पारित होने के बावजूद उनका पालन नहीं किया गया। इसके अलावा बड़ी संख्या में आवेदन लंबित पाए गए, जिनमें से कई निर्धारित समय सीमा से काफी अधिक समय तक निष्पादित नहीं हुए थे। कुछ मामलों में तो अभिलेखों के ‘ट्रेसलेस’ होने की बात भी सामने आई, जो प्रशासनिक लापरवाही की गंभीरता को और बढ़ा देती है।

इन सभी तथ्यों के आधार पर जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अंचल अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की। इसके बाद विभागीय स्तर पर उन्हें निलंबित भी कर दिया गया, जिससे यह संकेत मिला कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। लगभग एक वर्ष तक निलंबन की स्थिति में रहने के बाद संबंधित अधिकारी को न केवल बहाल कर दिया गया, बल्कि उन्हें पटना शहर के ही एक अन्य अंचल में फिर से जिम्मेदारी सौंप दी गई। यही वह बिंदु है जहां से पूरे मामले ने नया मोड़ लिया और विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे।

सबसे अहम बात यह है कि विभागीय जांच में लगाए गए आरोपों को सही पाया गया था और इसके आधार पर दंड निर्धारण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद यदि अधिकारी को दोबारा उसी स्तर की जिम्मेदारी दी जाती है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आम जनता के बीच भी इस तरह की घटनाएं यह संदेश देती हैं कि जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और कठोरता दोनों जरूरी हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में कोई भी अधिकारी नियमों की अनदेखी करने का साहस न करे। प्रशासनिक ढांचे में अनुशासन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई सिर्फ औपचारिकता तक सीमित न रह जाए, बल्कि उसका प्रभाव भी दिखे।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है कि क्या विभागीय जांच और निलंबन जैसी प्रक्रियाएं वास्तव में सुधार लाने में कारगर हैं या फिर वे केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती हैं। यदि गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारी को दोबारा महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है, तो इससे न केवल सिस्टम की साख प्रभावित होती है बल्कि आम लोगों का भरोसा भी कमजोर होता है।

फिलहाल यह मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है और उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस पर स्पष्ट रुख अपनाएगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस तरह के मामलों में कोई ठोस नीति बनाई जाती है या फिर यह सिलसिला इसी तरह चलता रहेगा।

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